
राजनांदगांव।
शिवनाथ नदी का नाम अब एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार कारण कुछ और ही है। पिछले कुछ समय से, नदी के किनारे अवैध रेत खनन की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे स्थानीय पर्यावरण और समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। यह सवाल उठता है कि खनिज विभाग और स्थानीय प्रशासन इस मामले में इतना लापरवाह क्यों है?
रेत माफियाओं का बढ़ता प्रभाव-रेत का अवैध खनन एक संगठित अपराध बन चुका है, जिसमें रेत माफिया स्थानीय लोगों की जदिगी और पर्यावरण को प्रभावित कर रहे हैं। बिना किसी रॉयल्टी के रेत निकालने के चलते सरकारी राजस्व को भी नुकसान हो रहा है। स्थानीय गांवों के लोग बार-बार इस समस्या की ओर इशारा कर रहे हैं, लेकिन कार्रवाई की कमी से उनकी आवाजें अनसुनी रह गई हैं।
खनिज विभाग की लापरवाही खनिज विभाग की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। अवैध खनन की जानकारी होने के बावजूद, विभाग ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। क्या यह विभाग रेत माफियाओं की साजिश का शिकार है, या फिर इनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि प्रशासन कार्रवाई करने में असमर्थ है? यह एक बड़ा सवाल है, जिसका जवाब तलाशना
जरूरी है। पर्यावरण पर प्रभाव अवैध रेत खनन से केवल आर्थिक नुकसान नहीं हो रहा है, बल्कि यह पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। नदी की धारा में परिवर्तन, जल स्तर में गिरावट और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव इसकी केवल कुछ झलकियाँ हैं। जब नदी के किनारों से रेत निकाली जाती है, तो इससे मिट्टी का कटाव बढ़ता है, जो स्थानीय खेती और जल संरक्षण को प्रभावित कर सकता है।
स्थानीय निवासियों की आवाज़-स्थानीय निवासी इस समस्या से परेशान हैं। कई लोगों का
कहना है कि रेत माफिया स्थानीय युवाओं को अपने साथ जोड़कर उन्हें अवैध खनन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इससे न केवल युवाओं का भविष्य संकट में है, बल्कि स्थानीय समाज भी इसकी कीमत चुका रहा है। अब समय आ गया है कि प्रशासन इन मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान दे।
समाधान की दिशा में कदम-इस स्थिति का समाधान निकालना अत्यंत आवश्यक है। खनिज विभाग को अवैध खनन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए प्रभावी नीतियाँ बनानी चाहिए। साथ ही, स्थानीय पुलिस और प्रशासन को भी इस मुद्दे को गंभीरता से लेना चाहिए। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
