➡️ महंगाई पर कांग्रेस नेता का केंद्र सरकार पर हमला
राजनांदगांव।
देश में लगातार बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। रसोई से लेकर बाजार तक हर तरफ महंगाई का असर दिखाई दे रहा है। चावल, दाल, खाद्य सामग्री और रोजमर्रा की जरूरतों की वस्तुओं के दाम बढ़ने से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों का घरेलू बजट पूरी तरह बिगड़ता जा रहा है। वहीं दूसरी ओर किसानों को उनकी मेहनत और उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। इस दोहरी मार को लेकर शहर जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री विरेंद्र चंद्राकर ने केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए महंगाई नियंत्रण में विफल रहने का आरोप लगाया है।
श्री चंद्राकर ने कहा कि देश में आज एक अजीब स्थिति बनी हुई है। एक तरफ किसान अपनी मेहनत से धान का उत्पादन कर रहा है लेकिन उसे अपनी उपज का अपेक्षित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। दूसरी तरफ बाजार में वही धान चावल बनकर आम उपभोक्ताओं को महंगे दामों पर खरीदना पड़ रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसान से कम कीमत पर धान खरीदने और उपभोक्ता को महंगे दाम पर चावल बेचने के बीच जो अंतर पैदा हो रहा है उसका वास्तविक लाभ आखिर किसे मिल रहा है। उन्होंने कहा कि यदि किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा और आम जनता को सस्ते दाम पर खाद्यान्न उपलब्ध नहीं हो पा रहा, तो सरकार की नीतियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। धान और चावल की कीमतों के बीच बढ़ते अंतर की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस पूरी व्यवस्था में किसानों और उपभोक्ताओं के हितों की अनदेखी क्यों हो रही है और बिचौलियों को किस आधार पर फायदा मिल रहा है। श्री चंद्राकर ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार चुनाव के समय महंगाई कम करने, किसानों की आय बढ़ाने और आम जनता को राहत देने के बड़े-बड़े वादे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है। रसोई गैस, दाल, चावल, खाद्य तेल, डीजल-पेट्रोल सहित दैनिक उपयोग की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। सीमित आमदनी में परिवार चलाने वाले लोगों के लिए अब जरूरी जरूरतें पूरी करना भी चुनौती बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि महंगाई का सबसे अधिक असर गरीब, मजदूर, किसान और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है। जिन परिवारों की आमदनी सीमित है, उन्हें अपनी जरूरतों में कटौती करनी पड़ रही है। दूसरी ओर किसानों को खेती की बढ़ती लागत, खाद-बीज, मजदूरी और डीजल के खर्च के बीच अपनी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा है। सरकार एक तरफ किसानों के सम्मान और आय बढ़ाने की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ किसान अपनी फसल के उचित दाम के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। श्री चंद्राकर ने केंद्र सरकार से मांग की कि महंगाई पर नियंत्रण के लिए केवल बयानबाजी और प्रचार के बजाय ठोस कदम उठाए जाएं। खाद्यान्न की कीमतों पर प्रभावी निगरानी रखी जाए, जमाखोरी और कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो तथा धान और चावल की कीमतों के बीच बढ़ते अंतर के कारणों की जांच कराई जाए। साथ ही किसानों को उनकी उपज का उचित और लाभकारी मूल्य सुनिश्चित किया जाए, ताकि उत्पादक किसान और आम उपभोक्ता दोनों को राहत मिल सके। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता बड़े व्यापारिक हितों के बजाय देश के किसान, गरीब और आम नागरिक होने चाहिए। जब किसान अपनी फसल का उचित मूल्य पाने के लिए परेशान हो और आम आदमी महंगे खाद्यान्न खरीदने को मजबूर हो, तब सरकार की आर्थिक नीतियों की जवाबदेही तय होना जरूरी है। अंत में विरेंद्र चंद्राकर ने कहा कि जनता को चुनावी वादे, भाषण और प्रचार नहीं, बल्कि महंगाई से वास्तविक राहत चाहिए। किसानों को केवल सम्मान के नारे नहीं, बल्कि उनकी मेहनत और फसल का उचित दाम चाहिए। केंद्र सरकार को आम जनता और किसानों की परेशानियों को समझते हुए तत्काल प्रभावी कदम उठाने चाहिए।





