फसलों में रोग व कीटों की पहचान कर समय पर करें नियंत्रण : कृषि विज्ञान केंद्र

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राजनांदगांव। धान की फसल को कीटों और रोगों के प्रकोप से बचाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) सुरगी, राजनांदगांव ने किसानों के लिए महत्वपूर्ण समसामयिक परामर्श जारी किया है। वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेतों की नियमित निगरानी करें और शुरुआती लक्षणों के आधार पर ही कीट व रोगों की सही पहचान कर अनुशंसित दवाओं का नियंत्रित प्रयोग करें।

कृषि विज्ञान केंद्र सुरगी की वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. गुंजन झा तथा फार्म मैनेजर डॉ. आशीष गौरव शुक्ला ने बताया कि वर्तमान मौसम में धान की फसल पर तना छेदक, पत्ती लपेटक, भूरा माहू, गंधी बग, पैनिकल माइट जैसी कीट व्याधियों के साथ-साथ जीवाणु जनित झुलसा, ब्लास्ट और शीथ ब्लाइट रोगों का खतरा बना रहता है।

प्रमुख कीट-रोग, लक्षण और उनके नियंत्रण के उपाय:

तना छेदक (डेड हार्ट व व्हाइट ईयर): शुरुआती प्रकोप में प्रोफेनोफॉस 40% + साइपरमेथ्रिन 4% ईसी (400 मिली/एकड़) तथा अधिक प्रकोप होने पर क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 9.3% + लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन 4.6% जेडसी (100 मिली/एकड़) का छिड़काव करें।

पत्ती लपेटक: पत्तियों का मुड़ना और उन पर सफेद धारियां दिखना इसके लक्षण हैं। इसके लिए प्रोफेनोफॉस 40% + साइपरमेथ्रिन 4% ईसी (400 मिली/एकड़) का प्रयोग करें।

भूरा माहू (हॉपर बर्न): पौधे के निचले हिस्सों में कीटों का समूह जमा हो जाता है, जिससे पौधे सूखने लगते हैं। इसके नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एससी (100 मिली/एकड़) अथवा डाइनोटेफ्यूरान 10% + पाइमेट्रोजीन 40% डब्ल्यूजी (100 ग्राम/एकड़) उपयोगी है।

गंधी बग: दूधिया अवस्था में दानों का रस चूसकर यह फसल को नुकसान पहुंचाता है। बचाव के लिए लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन 5% ईसी (100 मिली/एकड़) का प्रयोग करें।

जीवाणु जनित झुलसा: पत्तियों के किनारों पर पीले धब्बे दिखने पर जल निकास की व्यवस्था करें और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% डब्ल्यूपी (500 ग्राम/एकड़) + स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट 90% + टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड 10% एसपी (20 ग्राम/एकड़) का छिड़काव करें।

ब्लास्ट रोग: पत्तियों पर नाव के आकार के धब्बे दिखने पर ट्राइसाइक्लाजोल 75% डब्ल्यूपी (120 ग्राम/एकड़) का छिड़काव करें।

शीथ ब्लाइट: पत्ती की खोल पर हरे-धूसर धब्बे बनने पर हेक्साकोनाजोल 5% एससी (350 मिली/एकड़) का उपयोग करें।

वैज्ञानिकों ने किसानों को स्पष्ट किया कि अनावश्यक और बार-बार कीटनाशकों के प्रयोग से बचें। संतुलित उर्वरक प्रबंधन, उचित जल प्रबंधन और समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) को अपनाकर फसल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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