रायपुर.
स्वाभिमानी व्यक्ति न तो हैसियत देखता है और न ही हस्ती… वह तो सच के लिए बड़ी से बड़ी ताकत से भी टकराने से नहीं हिचकता… फिर चाहे सामने बादशाह हो या फिर प्रधानमँत्री के छोटे भ्राता ही क्यूँ न हो. अपने आदर्श ‘मेवाड़ का शेर’ महाराणा प्रताप, ‘शहीद-ए- आज़म’ सरदार भगत सिंह के नक्शे कदम पर चल रही एक ऐसी ही शख्सियत भाई वीरेन्द्र सिंह तोमर की है जिनका 14 अगस्त को जन्मदिन भी है.
आपको इतिहास में थोड़ा पीछे लिए चलते हैं. उत्तर प्रदेश के एक जिले का नाम है फ़तेहपुर. इसी फ़तेहपुर अँतर्गत कागा तहसील के ग्राम टेसाही में किसान स्वर्गीय श्री ओमप्रकाश जी तोमर रहा करते थे.
अपनी अर्धांगिनी श्रीमती शँकुलता तोमर के साथ ओमप्रकाश जी खेती किसानी करते हुए जीवन यापन कर रहे थे. वर्ष 1981 का वह 14 अगस्त जब श्रीमती शँकुलता तोमर ने एक बालक को जन्म दिया. इसी बालक का नामकरण वीरेन्द्र सिंह तोमर हुआ.
जैसे जैसे यह बालक (वीरेन्द्र सिंह तोमर) बढ़ने लगा वैसे वैसे घर परिवार में खुशहाली आने लगी. बालक वीरेन्द्र के बचपने में ही उनके शेर दिल होने का अहसास घर-परिवार -समाज को होने लगा था.
इधर तोमर परिवार में सदस्यों की सँख्या बढ़ते गई. पहले, दो पुत्रियों के बाद फिर एक पुत्र की प्राप्ति तोमर दँपत्ति को हो चुकी थी. परिवार बढ़ रहा था और खेती से होने वाली आय कम पड़ रही थी.
ऐसे में परिवार के मुखिया ओमप्रकाश जी ने परदेस का रूख करने का निर्णय ले लिया. वह पहले रायपुर आए और फिर बाद में अपनी माताश्री सँग वीरेन्द्र, उनकी दोनों बहनें, छोटा भाई रोहित भी यहाँ के निवासी हो गए.
यह बात साल 1990 की है. उस समय वीरेन्द्र सिंह तोमर महज 9 साल के हुआ करते थे. धीरे धीरे तोमर परिवार, छत्तीसगढ़ को और छत्तीसगढ़, तोमर परिवार को अपनाने लगा.
0 2006 जिसने बदल दी ज़िदगी …
वर्ष 2006 का मनहूस मई माह. 18 मई जब ओमप्रकाश जी अपने परिवार का साथ छोड़ गए. 25 साल के युवा वीरेन्द्र के कँधों पर अब तोमर परिवार की भी जिम्मेदारी आ गई थी.
पहाड़ सरीखे जैसे दुख को पीछे छोड़ने माताश्री शँकुलता देवी ने अपने बड़े सुपुत्र वीरेन्द तोमर को दाँपत्य जीवन में बाँधने का निर्णय लिया. सुयोग्य वधु की तलाश प्रतापगढ़ (यूपी) में शुभ्रा सिंह के रूप में पूरी हुई.
अँततः 3 दिसँबर वर्ष 2007 को शुभ्रा सिंह तोमर, वीरेन्द्र सिंह की जीवन संगिनी बनीं. इसके बाद जैसे वीरेन्द्र सिंह की किस्मत और मेहनत को एक नई दिशा मिल गई. धीरे धीरे ही सही लेकिन वीरेन्द्र अब 36 कौम में अपनी जगह बनाने लगे थे.
इधर, वीरेन्द्र और शुभ्रा को वर्ष 2009 में सुपुत्री (अनुभव सिंह तोमर) व 2010 में सुपुत्र (विक्रमादित्य सिंह) की प्राप्ति हुई. परिवार बढ़ने लगा था. इसके साथ ही वीरेन्द्र सिंह तोमर की जिम्मेदारी भी लेकिन श्रीमती शुभ्रा सिंह ने उनका कँधे से कँधा मिलाकर साथ दिया.
पहले व्यवसाय और फिर परिवार… दोनों ही मोर्चे पर वीरेन्द्र – शुभ्रा की यह जोड़ी जैसे जूझने लगी. दोनों बहनों और छोटे भाई के हाथ पीले कराए गए. करणी माँ सहित
प्रभु श्रीराम, हनुमान जी महाराज, राधारानी और माताश्री का भी आशीर्वाद जैसे चमत्कार करने लगा.
वीरेन्द्र सिंह तोमर ने हड्डी तोड़ मेहनत से भी गुरेज नहीं किया. व्यापार के साथ ही वह समाज में भी अपनी जगह बनाने लगे थे. वर्ष 2016 के आते आते उन्होंने क्षत्रिय करणी सेना से जुड़कर राजपूतों सहित 36 कौम की सेवा का सँकल्प ले लिया. जिसे आज भी वह पूरी तन्मयता से निभा रहे हैं.
पहले उन्हें क्षत्रिय करणी सेना का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. समाज के प्रति सहभागिता की उनकी भावना को देखकर आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, क्षत्रिय करणी सेना का भी दायित्व उनके मजबूत कँधों पर डाल दिया गया.
0 कब और कैसे मिली उपाधि . . .
अब आते हैं खबर के शीर्षक पर . . . सवाल यह उढ़ता है कि छत्तीसगढ़ का शेर – ए – हिंद कब और क्यूँ कहलाने लगे. तो इसके पीछे भी जबरदस्त रोचक किस्सा है. बात वर्ष 2018 की है. उस समय छत्तीसगढ़ के दौरे पर प्रहलाद मोदी आए हुए थे.
फिलहाल, देश में अहमदाबाद का एक मोदी परिवार बेहद ताकतवर माना जाता है. दरअसल, इसी मोदी परिवार के नरेंद्रभाई मोदी इस वक्त ‘भारत के भाग्य विधाता’ कही जाने वाली प्रधानमँत्री की कुर्सी पर विराजित हैं.
अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने वाले पहले गैर – काँग्रेसी प्रधानमँत्री नरेंद्रभाई मोदी ही हैं. उन्होंने वर्ष 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कुलजमा 282 सीट पर जीत हासिल करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
यह 543 लोकसभा सीटों वाली सँसद में बहुमत के आँकड़े 272 से 10 अधिक ही थी. चूँकि भाजपा ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गढ़बँधन (एनड़ीए) के बैनर तले चुनाव लड़ा था इस कारण इसे एनड़ीए की जीत (336 सीट) बताया जाता है, नहीं तो कायदे से भाजपा की जीत वाला यह लोस चुनाव था.
2018 में छत्तीसगढ़ प्रवास पर आए प्रहलाद मोदी, प्रधानमँत्री नरेंद्रभाई मोदी के सगे भाई हैं. सोमाभाई मोदी, अमृतभाई मोदी के बाद नरेंद्र मोदीजी का नँबर आता है. सबसे छोटे व गुजरात सरकार के सूचना विभाग में कार्यरत रहे पँकजभाई मोदी और इकलौती बहन बसँती बेन हसमुखलाल मोदी से परे यहाँ बात प्रहलादभाई मोदी की है जोकि घर में प्रधानमँत्री से छोटे हैं.
अहमदाबाद के किराना व्यवसायी बताए जाने वाले प्रहलादभाई मोदी ऑल इंडिया फेयर प्राइस शॉप डीलर्स फेडरेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बताए जाते हैं. उन्होंने ही अपने बिलासपुर प्रवास के दौरान राजपूत समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी.
… लेकिन मोदी परिवार का जलवा और प्रभाव देखिए कि राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तर की ‘मैनस्ट्रीम मीडिया’ से यह खबर ही गायब थी. ‘सोशल मीडिया ऐज’ में लेकिन ‘वायरल’ शब्द जबरदस्त काम करता है. उसी ने प्रहलादभाई मोदी की आपत्तिजनक टिप्पणी को पूरे देश – विदेश में बसे राजपूतों के मध्य आक्रोश भरने के काम में लगा दिया.
चँद घँटों के ही भीतर जैसे राजपूत की म्यान से तलवार निकलती है वैसी परिस्थिति बन गई. फिर भी दुर्भाग्य देखिए कि छत्तीसगढ़ के किसी भी सवर्ण समाज के किसी भी व्यक्ति ने प्रहलादभाई मोदी अथवा उनकी कथित टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया दी हो.
वह तो क्षत्रिय करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष भाई वीरेन्द्र सिंह तोमर का साधुवाद कि उन्होंने क्षत्राणी के दूध की लाज रख ली. वह अपने काफिले के साथ उस बिलासपुर में धमक पड़े जहाँ पर ‘प्रधानमँत्री साहब’ के छोटे भाई प्रहलादभाई मोदी ‘छत्तीसगढ़ के आतिथ्य’ का आनँद ले रहे थे.
वीरेन्द्र सिंह तोमर ने पूरे मान सम्मान के साथ प्रहलादभाई मोदी से बात करते हुए जाने – अनजाने में उनके द्वारा की गलती का अहसास कराया, अपनी आपत्ति उनकी टिप्पणी पर जताई.
ठँड़े दिमाग़ से किया गया कोई भी सँवाद कभी भी सार्थक ही होता है.
इसका अहसास तब हुआ जब वीरेन्द्र सिंह तोमर द्वारा दिए गए तथ्यों और तर्कों के सामने देश में बहुचर्चित, ताकतवर मोदी परिवार के प्रहलादभाई ने अपने ‘ कँधे झुका ‘ दिए. उन्होंने बिना किसी शर्त के कैमरे के सामने क्षत्रियों से माफी भी माँगी.
इस शेरदिली के चलते ही बाद में क्षत्रिय करणी सेना, सवर्ण समाज सहित 36 कौम के सम्मानित प्रतिनिधियों ने वीरेन्द्र भाई का सम्मान भी किया था. इसी सम्मान समारोह में उन्हें छत्तीसगढ़ का शेर – ए – हिंद की उपाधि दी गई थी.
वीरेन्द्र सिंह तोमर ने इस उपाधि का मान सम्मान बनाए रखा है. उन्होंने इस बात का भी पूरा ध्यान रखा है कि उनके किसी भी कृत्य से यह उपाधि और इसे देने वाले बेहद सम्मानित सर्वसमाज के सँगी साथियों को अपना शीश नीचा न करना पड़े.
बहरहाल, क्षत्रिय करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष भाई वीरेन्द्र सिंह तोमर को उनके जन्मदिन (14 अगस्त) की बधाई … शुभकामनायें !
…आगे पीछे का शेष फिर कभी, कहीं पर !

