नई दिल्ली/रायपुर। देश में नागरिकों को त्वरित, सुलभ और कम खर्च में विवादों का समाधान उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित नेशनल लोक अदालत की कार्यप्रणाली को लेकर अब गंभीर जनहित के सवाल उठने लगे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर शिकायतकर्ता शिवशंकर सिंह ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), संबंधित राज्यपाल तथा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SALSA) के समक्ष शिकायत/निवेदन प्रस्तुत कर लोक अदालत की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र समीक्षा और आवश्यक सुधारात्मक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है।
शिकायत का मूल सवाल है—यदि किसी विवाद की उत्पत्ति ही किसी सरकारी अधिकारी या विभाग द्वारा कथित रूप से अपने वैधानिक कर्तव्य का समय पर पालन न करने से हुई है, तो क्या केवल लोक अदालत में समझौता कराकर उस विवाद को समाप्त कर देना पर्याप्त न्याय माना जा सकता है?
शिवशंकर सिंह ने कहा है कि लोक अदालत विवादों को समाप्त करने की महत्वपूर्ण वैकल्पिक व्यवस्था है, लेकिन विवाद समाप्त होना और विवाद पैदा करने वाले कारण की जवाबदेही तय होना—दो अलग-अलग प्रश्न हैं।
नेशनल लोक अदालत पर 10 बड़े सवाल
- प्रशासनिक लापरवाही की कीमत नागरिक क्यों चुकाए?
यदि किसी अधिकारी ने समय पर आवेदन का निराकरण नहीं किया और उसकी वजह से विवाद न्यायालय तक पहुंच गया, तो लोक अदालत में समझौता करने से पहले संबंधित अधिकारी की भूमिका की जांच क्यों न हो? - वर्षों की देरी का जिम्मेदार कौन?
राजस्व रिकॉर्ड, नामांतरण, सीमांकन, रिकॉर्ड दुरुस्ती और अन्य प्रशासनिक कार्यों में यदि वर्षों तक देरी होती है, तो नागरिक को बार-बार कार्यालय और न्यायालय के चक्कर लगाने के लिए कौन जिम्मेदार है? - क्या समझौता मूल प्रशासनिक गलती को समाप्त कर देता है?
यदि गलत बिलिंग, गलत रिकॉर्ड, सेवा में कमी या विभागीय निर्णय से विवाद पैदा हुआ है, तो पक्षकारों के बीच समझौता होने के बाद भी मूल गलती और उसकी जिम्मेदारी की जांच होनी चाहिए या नहीं? - कमजोर पक्ष की सहमति कितनी स्वतंत्र है?
आर्थिक रूप से कमजोर, अशिक्षित या लंबे समय से सरकारी तंत्र से संघर्ष कर रहे व्यक्ति द्वारा किया गया समझौता वास्तव में स्वतंत्र और सूचित सहमति पर आधारित है या परिस्थितिजन्य मजबूरी का परिणाम—इसकी जांच कैसे होगी? - क्या पक्षकारों को समझौते के कानूनी परिणाम समझाए जाते हैं?
लोक अदालत के समझौते के बाद अवार्ड की अंतिमता और उसके कानूनी प्रभाव की जानकारी प्रत्येक पक्षकार को स्पष्ट रूप से दी जाती है या नहीं? - ‘तारीख पर तारीख’ के बाद समझौता क्यों?
यदि कोई मामला वर्षों तक लंबित रहा और लगातार तारीखें मिलती रहीं, तो केवल अंत में समझौते के माध्यम से मामला समाप्त करने के बजाय न्यायिक विलंब के कारणों की समीक्षा क्यों न हो? - लोक अदालत की सफलता का पैमाना क्या है?
क्या सफलता केवल इस बात से मापी जानी चाहिए कि कितने मामलों का निपटारा हुआ, या यह भी देखा जाना चाहिए कि कितने मामलों में वास्तविक, स्वैच्छिक और सूचित सहमति से न्याय हुआ? - सरकारी विभागों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
बिजली, पानी, बीमा, बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं अथवा अन्य सार्वजनिक सेवाओं में विभागीय लापरवाही से विवाद उत्पन्न होने पर केवल नागरिक और संस्था के बीच समझौता पर्याप्त है या जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए? - लोक अदालत में दबाव की शिकायतों की निगरानी कौन करेगा?
यदि किसी पक्षकार को दबाव, भय, आर्थिक मजबूरी अथवा अन्य परिस्थितियों में समझौता करना पड़ा हो, तो ऐसी शिकायतों की स्वतंत्र जांच की व्यवस्था कितनी प्रभावी है? - क्या लोक अदालत आंकड़े घटाने का माध्यम बन रही है?
सबसे बड़ा नीतिगत सवाल यही है कि क्या लोक अदालतों का उद्देश्य वास्तविक न्याय तक पहुंच बढ़ाना है या कहीं मामलों के निपटारे के आंकड़े बढ़ाना प्राथमिक लक्ष्य तो नहीं बन रहा?
शिवशंकर सिंह का बड़ा बयान
“लोक अदालत न्याय व्यवस्था का विरोध नहीं, बल्कि उसे और अधिक जवाबदेह एवं नागरिक-केंद्रित बनाने की मांग है। हमारा सवाल लोक अदालत की आवश्यकता पर नहीं, बल्कि उसकी कार्यप्रणाली और उसके पीछे छिपे प्रशासनिक कारणों की जवाबदेही पर है। यदि किसी सरकारी अधिकारी की लापरवाही से विवाद पैदा हुआ और वर्षों बाद उसी नागरिक को समझौते के लिए लोक अदालत में जाना पड़ा, तो केवल नागरिक और दूसरे पक्ष के बीच समझौता करा देना पर्याप्त नहीं है। पहले यह भी पता चलना चाहिए कि विवाद पैदा ही क्यों हुआ और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।”
उन्होंने आगे कहा कि “न्याय का अर्थ केवल केस की फाइल बंद होना नहीं है। न्याय का अर्थ यह भी है कि नागरिक के अधिकार सुरक्षित रहें, उसकी सहमति स्वतंत्र हो और सरकारी तंत्र की गलती का बोझ नागरिक पर न पड़े।”
धारा 21 को लेकर भी उठी गंभीर चिंता
शिकायत में विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 21 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि लोक अदालत में समझौते के आधार पर पारित अवार्ड सिविल कोर्ट की डिक्री के समान माना जाता है तथा वह पक्षकारों पर अंतिम और बाध्यकारी होता है।
इसी कारण शिकायतकर्ता ने मांग की है कि समझौते से पहले पक्षकारों को उसके कानूनी प्रभाव और अधिकारों की स्पष्ट जानकारी दी जाए तथा आवश्यकता होने पर कमजोर पक्षकार को स्वतंत्र विधिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
अनुच्छेद 39-A की भावना को जमीन पर लागू करने की मांग
शिकायत में संविधान के अनुच्छेद 39-A की भावना का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि न्याय तक समान अवसर और प्रभावी विधिक सहायता केवल संवैधानिक सिद्धांत न रह जाए, बल्कि उसकी वास्तविक पहुंच प्रत्येक नागरिक तक हो।
शिकायतकर्ता ने विशेष रूप से मांग की है कि प्रशासनिक देरी या कथित लापरवाही से पैदा होने वाले मामलों का राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन कराया जाए और ऐसे मामलों में लोक अदालत में समझौते से पहले प्रशासनिक जवाबदेही की समीक्षा की व्यवस्था विकसित की जाए।
मांगें केवल जांच तक सीमित नहीं
शिवशंकर सिंह ने मांग की है कि—
प्रशासनिक देरी से उत्पन्न विवादों का राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन हो।
लंबे समय तक आवेदन लंबित रखने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
समझौते से पहले पक्षकारों को कानूनी परिणामों की लिखित जानकारी दी जाए।
कमजोर पक्षकारों को स्वतंत्र विधिक सहायता उपलब्ध हो।
दबाव या मजबूरी में समझौते को रोकने के लिए प्रभावी निगरानी हो।
प्रशासनिक लापरवाही से जुड़े मामलों में आवश्यकतानुसार मूल कारण की जांच हो।
बिजली, पानी, राजस्व, बीमा और सार्वजनिक सेवाओं के लिए प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था बने।
SALSA द्वारा लोक अदालतों के वास्तविक समझौतों और वापस भेजे गए मामलों की वार्षिक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
न्यायिक लंबित मामलों और प्रशासनिक देरी के कारणों की संयुक्त समीक्षा हो।
लोक अदालत को केवल “निपटारा संख्या बढ़ाने” का माध्यम न बनाया जाए।
स्वतंत्र अध्ययन समिति गठित कर लोक अदालत व्यवस्था की प्रभावशीलता की समीक्षा की जाए।
शिकायतकर्ता को जांच और कार्रवाई की रिपोर्ट लिखित रूप में दी जाए।
अब सवाल सरकार और विधिक सेवा संस्थाओं के सामने
लोक अदालत भारतीय न्याय व्यवस्था में विवादों के वैकल्पिक समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन इस व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी और मजबूत होगी जब मामले के निपटारे के साथ-साथ उस विवाद की मूल वजह पर भी ध्यान दिया जाए।
शिवशंकर सिंह की शिकायत ने इसी बुनियादी प्रश्न को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है—
“अगर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समय पर निभाता, तो क्या उस विवाद को लोक अदालत तक पहुंचने की जरूरत ही पड़ती?”
अब निगाहें राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, NALSA और संबंधित राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों की कार्रवाई पर हैं। यदि इस शिकायत पर स्वतंत्र अध्ययन और सुधारात्मक कदम उठते हैं, तो यह पहल देश में त्वरित न्याय के साथ प्रशासनिक जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।


